सिद्धान्त-माधुरी · पद 105
सखी मन मरम न जाने कोय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sakhī! mana marama na jāne koya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1सखी मन मरम न जाने कोय।
2ज्यों ज्यों भीजै श्याम रंग मन, त्यों त्यों ऊजर होय।
3हिय बिच समुझि परत नहिं नेकहुँ, कान्ह कि प्रान कि दोय।
4कबहूँ पिय निज ढिग लखि रोवत, कबहुँ दूर लखि रोय।
5कबहुँ मिलन महँ विरह अनुभवत, सत्य कहौं सखि तोय।
6किमि “कृपालु” कहि सक जब ज्ञानी, बरबस ज्ञान बिगोय॥
हिन्दी भावार्थ
(एक सखि अपनी सखि से कहती है-) अरी सखी! मेरे मन के रहस्यों को कोई नहीं जानता। यह मन श्याम रंग में जैसे-जैसे भीजता जाता है वैसे-ही वैसे उज्ज्वल होता जाता है। अरी सखि! यह समझ में नहीं आता कि हृदय में श्यामसुन्दर हैं या प्राण हैं, या दोनों ही हैं। कभी तो प्रियतम को अपने पास ही देखकर मैं रोने लगती हूँ और कभी उन्हें अपने से दूर समझकर रोने लगती हूँ। 'कृपालु' कहते हैं कि इस प्रेम के रहस्य को मैं क्या बतलाऊँ जबकि ज्ञानियों का भी ज्ञान नहीं जान पाता है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 144