सिद्धान्त-माधुरी · पद 104
सखी कोउ एक बात समुझाय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sakhī! kou eka bāta samujhāya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1सखी कोउ एक बात समुझाय।
2जग महँ जेतिक प्रीति होति सब, छिन छिन छीजति जाय।
3यह नहिं सुनी कहति सखि हमरेहुँ, सुत पति भगिनी भाय।
4पै कत हरि ते प्रीति सखिन की, छिन छिन बढ़ति सदाय।
5सखि कह जग सब प्राकृत जन सखि, प्राकृत तन मन पाय।
6तेरो पिय “कृपालु” चिन्मय जो, नित नव नव दिखराय॥
हिन्दी भावार्थ
अरी सखि! कोई यह मर्म समझा दे। संसार में, स्त्री पति सम्बन्धी जितना भी प्रेम है वह प्रतिक्षण घटता जाता है। यह मैं सुनी हुई नहीं कह रही हूँ, हमारे भी पुत्र, पति, बहन, भाई आदि हैं। मेरा अनुभव है। किन्तु सखियों का श्यामसुन्दर सम्बन्धी प्रेम प्रतिक्षण बढ़ता जाता है। सखी ने उत्तर दिया-अरी सखि! संसार के सभी जीव माया के अधीन हैं। उनका तन-मन सभी कुछ मायिक है, एवं स्वार्थी भी हैं क्योंकि वे अनादि काल से परमानन्द से वंचित हैं। 'कृपालु' के शब्दों में तेरे प्रियतम का तन-मन सब दिव्य चिन्मय है और वे पूर्णकाम हैं, किसी जीवात्मा से उन्हें कोई स्वार्थ नहीं; क्योंकि वे सदा दिव्यानन्दमय हैं। अतएव उनसे किया हुआ प्रेम प्रतिक्षण बढ़ता जाता है। दूसरा कारण यह भी है कि दिव्य चिन्मय देह की विशेषता यह है कि जितनी बार देखिये नित्य नवीन-नवीन दिखाई पड़ता है; अतएव तृप्ति नहीं होती।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 143-144