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RADHEY RADHEY

सिद्धान्त-माधुरी · पद 103

संत जन बारह मास बसंत।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: santa jana, bāraha māsa basanta

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1संत जन बारह मास बसंत।

2पिउ पिउ कहि कहि छिन छिन निशिदिन, कूकत कोकिल संत।

3कबहुँक झरत दृगन अँसुवन जनु, झर तरु-पत्र अनंत।

4कबहुँक झूमि झूमि मधुकर जनु, गुनगुनात गुन कंत।

5कबहुँ प्रमत्त फूल सरसोँ जनु, फूलि फूलि हरषंत।

6प्रेम बसंत “कृपालु” नित्य रह, रस सरसंत न अंत॥

हिन्दी भावार्थ

संत महात्माओं के पास बारहों महीने बसन्त का निवास रहता है। समान अत्यन्त प्रेम भरी ध्वनि में निरन्तर पिउ'पिउ'ऐसा कहा करते हैं। आँखों से निरन्तर प्रेमाश्रु गिराते रहते हैं। कालीन भौरे के समान गुनगुनाते हुए झूम-झूम कर प्रियतम श्यामसुन्दर के गुण गाते रहते हैं। फूली हुई सरसों के समान प्रियतम के प्रेम में प्रमत्त होकर आनन्दातिरेक से हृदय में फूले नहीं समाते। बसन्त काल तो दो महीने का ही होता है, किन्तु संतों का प्रेम बसन्त तो नित्य रहता है, एवं प्रतिक्षण-वर्द्धमान-रस अनन्तकाल तक प्रदान करता है।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 142-143