सिद्धान्त-माधुरी · पद 102
श्री राधेरानी प्रेम तत्व की सार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: shrī rādhe rānī, prema tatva kī sāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1श्री राधेरानी प्रेम तत्व की सार।
2निगमागम ते अगम सुगम अति, दीनन हित सुकुमार।
3विधि हरि हर की कौन बात जब, ब्रह्म न पायो पार।
4क्रंदन करुण सुनावत धावति, निज सुधि-देह बिसार।
5"राधे"नाम पुकारत राधे, बरसावति जलधार।
6मोहिं “कृपालु” अब भय काको जब, श्री राधे रखवार॥
हिन्दी भावार्थ
श्री वृषभानुनन्दिनी प्रेम तत्व की सार, अर्थात् महाभाव स्वरूपिणी हैं। आनन्द-ब्रह्म की सारभूत शक्ति का नाम ह्लादिनी शक्ति है। ह्लादिनी-शक्ति का भी सार प्रेम कहलाता है। प्रेम तत्त्व का भी सार महाभाव है-वही राधा तत्त्व है। किशोरी जी वेदों और शास्त्रों से भी सर्वथा अगम्य होते हुए भी दीनजनों के लिए अत्यंत सुगम हैं। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर आदि की तो राधा तत्त्व पाने की शक्ति ही कहाँ है, जब साक्षात् परात्पर पूर्णतम पुरुषोत्तम ब्रह्म भी जिसका पार नहीं पा सके। किशोरी जी दीनों के लिए इतनी सरल हैं कि जब भी दीन, आर्त भाव से 'राधे! कहकर उन्हें पुकारता है तब किशोरी जी भी अधीर होकर अपनी आँखों से आँसू बहाने लगती हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि जब ऐसी ही सरल, सुकुमार, अलबेली सरकार वृषभानुदुलारी हमारी रखवार हैं तब मुझे डर ही किसका है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 141-142