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RADHEY RADHEY

सिद्धान्त-माधुरी · पद 101

श्यामा श्याम शरण गहु रे मन!

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: shyāmā-shyāma sharaṇa gahu re mana!

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1श्यामा श्याम शरण गहु रे मन!

2युगल माधुरी ध्यान धरे उर, गाउ नाम गुन रहु वृंदावन।

3सखीभाव संतन अनुगत ह्वै, प्रेम सुधा पिवु लहु जीवनधन।

4ह्वै निष्काम धाम-निष्ठा गहि, गहवर वन विचरहु गोवर्धन।

5भरि भरि अंक लतन आनँद जल, झरझर झरि लावहु जनु सावन।

6इमि “कृपालु” मदमत्त रैन दिन, नित नव रस चाखहु मनभावन॥

हिन्दी भावार्थ

अरे मन! तू राधा-कृष्ण के चरण-कमलों की शरण हो जा, तथा राधा-कृष्ण का स्वरूप अपने हृदय में रखकर उनके विविध नाम गुणादिकों को प्रेम-विभोर होकर गाता हुआ निरन्तर वृन्दावन में ही निवास कर। गोपी प्रेम प्राप्त सखी भावयुक्त महापुरुषों की शरण होकर उस दिव्य प्रेमामृत का पान कर, जो तेरे जीवन का सर्वस्व है। निष्काम भाव रखते हुए श्री कृष्णधाम में चिन्मय दृष्टि रखकर गहृरवन एवं गोवर्धन में झूमते हुए विचरण कर। ब्रज को लताओं का बार-बार आलिंगन करके नेत्रों से आनन्द के आँसुओं की श्रावण की तरह झड़ी लगाते हुए वर्षा कर। 'कृपालु' कहते हैं-इस प्रकार तू प्रेम-रस में उन्मत्त होकर दिन-रात नित्य-प्रति नवीन-नवीन दिव्य रसों का मनमाना आस्वादन कर।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 140-141