सिद्धान्त-माधुरी · पद 100
श्याम तन भले भये घनश्याम।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: shyāma tana bhale bhaye ghanashyāma
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1श्याम तन भले भये घनश्याम।
2जो तुम होते गौर बरन तो, विष खातीं ब्रजबाम।
3भले भये अति निठुर श्याम जो, रहे द्वारिका ठाम।
4जो तुम होते सरल हृदय तो, प्रलय होत ब्रजधाम।
5भले भये तुम श्याम कंत इक, प्रिया अनंत ललाम।
6जो होते मोहन अनन्य तो, क्यों जीती सो बाम।
7जो “कृपालु” तुम होत लली तो, होति कौन गति राम!॥
हिन्दी भावार्थ
एक सखी कहती है कि हे श्यामसुन्दर! बड़ा अच्छा हुआ कि तुम काले रंग के हुए, अगर तुम गोरे रंग के होते तो समस्त ब्रजांगनायें तुम्हारे वियोग में जहर खाकर मर जातीं। बड़ा अच्छा हुआ कि तुमने अत्यन्त निष्ठुर स्वभाव पाया जो कि द्वारिकापुरी से ही लौट कर नहीं आये। अगर कहीं तुम सरल हृदय के होते तो समस्त ब्रजधाम में प्रलय हो जाती। बड़ा अच्छा हुआ कि तुम प्रियतम एक और तुम्हारी प्रेयसी अनन्त हैं। अगर तुम एक ही प्रेयसी से अनन्य प्रेम करते तो आनन्द के मारे उसके प्राण रह ही न पाते। इतने में "कृपालु ने कहा कि यह सब तो ठीक है, किन्तु यदि तुम लली होते, तो हाय राम! कौन गति होती।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 140