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RADHEY RADHEY

सिद्धान्त-माधुरी · पद 99

श्याम! अब तुमहिं मान लो हार।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: shyāma! aba tumahiṁ māna lo hāra

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1श्याम! अब तुमहिं मान लो हार।

2यह मन मूढ़ अनादि काल ते, ठाने हठहिं गमार।

3तुम कह कृपा करहुँ मैं जब मन, प्रणत होय इक बार।

4मन कह प्रथम कृपा करु तब हौं, अइहौं शरण तिहार।

5अति महान तुम पिता हमारे, पुत्र खात नित मार।

6माया दासिहिं बरजि"कृपालुहिं", देहु प्रेम सरकार॥

हिन्दी भावार्थ

हे श्यामसुन्दर! अब तुम ही अपनी हार मान लो। यह मूर्ख मन तो सदा से दुराग्रह किये है तुम कहते हो मैं कृपा तब करूँगा जब मन एक बार मेरी शरण में आ जाय। मन कहता है कि पहले कृपा कर दो तब मैं शरण में आऊँगा। तुम सरीखे महान् पिता को पाकर भी इस झगड़े में तुम्हारा पुत्र जीव कष्ट पा रहा है। 'कृपालु' कहते हैं-अतएव कृपा करके अपनी माया दासी को रोक लो एवं मुझे प्रेम-दान कर दो।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 139