लोड हो रहा है…लोड हुँदैछ…
Skip to main content
RADHEY RADHEY

सिद्धान्त-माधुरी · पद 93

लख्यो जग इक अचरज की बात।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: lakhyo jaga ika acharaja kī bāta

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1लख्यो जग इक अचरज की बात।

2बरसत बूँद पकरि नभ चढ़ि चह, जो मन बुधि न समात।

3विधि हरि हर जेहि जानि न पावत, प्रभु प्रभुता विख्यात।

4बिनु जाने प्रतीति नहिं तेहि बिनु, प्रीति न कतहुँ लखात।

5बिना प्रीति नहिं द्रवत पिया, यह, सोचि जिया अकुलात।

6यह “कृपालु” तो पिय-मग जोहत, खर्यो रहत दिन रात॥

हिन्दी भावार्थ

संसार की एक आश्चर्य की बात सुनो। बरसते हुए बादलों की बूँदों को पकड़कर जीव आकाश में चढ़ना चाहता है, जो कि मन-बुद्धि से परे का विषय है। यह सर्वसिद्ध विषय है कि भगवान् के रहस्यों को ब्रह्मा, विष्णु शंकर भी बुद्धि के बल से नहीं समझ सकते। बिना समझे विश्वास दृढ़ नहीं होता एवं बिना विश्वास के दृढ़ प्रेम भी नहीं हो सकता और बिना प्रेम के प्रियतम पिघलते भी नहीं। यह सब सोचकर हृदय अत्यन्त व्याकुल हो जाता है। 'कृपालु' कहते हैं कि मैं तो एकमात्र निरंतर प्रियतम श्री कृष्ण की कृपा की बाट जोह रहा हूँ।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 135