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RADHEY RADHEY

सिद्धान्त-माधुरी · पद 94

लख्यों मैं इक अचरज ब्रजधाम।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: lakhyoṁ maiṁ ika acharaja brajadhāma

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1लख्यों मैं इक अचरज ब्रजधाम।

2वेदवेद्य वेदज्ञ वेदकृत, जाको रूप न नाम।

3सोई ब्रह्म अंक यशुमति के, प्रकट्यो बनि घनश्याम।

4जो नहिं जात याज्ञवल्क्यादिक, किये यज्ञ निष्काम।

5सोई ब्रह्म नंद के प्रांगण, विहरत पंक ललाम।

6शक्ति “कृपालु” भक्ति की है यह, नहिं अचरज को काम॥

हिन्दी भावार्थ

मैंने ब्रजधाम में एक महान कौतुहल देखा। जो वेदों से जानने योग्य है, वेदों को जानने वाला है, वेदों को बनाने वाला है एवं जो नाम-रूप रहित है, वही ब्रह्म यशोदा की गोद में घनश्याम बन कर प्रकट हुआ है। जो महर्षि याज्ञवल्क्यादिक द्वारा किये हुए निष्काम यज्ञों में भी जाने में संकोच करता है वही ब्रह्म नन्द के आँगन की कीचड़ में आनन्दपूर्वक विहार करता है। 'कृपालु' कहते हैं कि भक्ति का ऐसा प्रभाव ही है इसमें आश्चर्य करने की आवश्यकता नहीं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 135-136