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RADHEY RADHEY

सिद्धान्त-माधुरी · पद 95

लख्योँ मैं इक अचरज संसार।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: lakhyoṁ maiṁ ika acharaja sansāra

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1लख्योँ मैं इक अचरज संसार।

2जासोँ सुनिय सोइ इमि भाखत,"यह संसार असार"।

3पै जाको देखिय सोइ खोजत, निज सुख विषय मझार।

4कहत सबै हरि की लीला अति, अलख अगम्य अपार।

5पै नित संशय करत चरित महँ, निज बुधि बलहिं बिसार।

6बिनु सत्संग कछुक नहिं पाइय, पचि पचि मरिय हजार।

7सो सत्संग “कृपालु” जानिये, श्रद्धा बिनु खिलवार॥

हिन्दी भावार्थ

मैंने संसार में एक बड़ी ही विचित्र बात देखी। वह यह कि जिस किसी व्यक्ति से सुनो, वह यही कहता है कि यह संसार मिथ्या है, जिस किसी को देखिए (इने-गिने बिरले जीवों को छोड़कर) वह अपना सुख मायिक विषयों में ही नित्य-प्रति खोज रहा है। वैसे तो सभी आस्तिक जन यह कहते हैं कि भगवान् की लीला का कोई पार नहीं पा सकता कोई जान नहीं सकता, किन्तु फिर भी वह सभी भगवान् की हुए तर्क करते हैं, थोड़ा भी अपनी बुद्धि के बल का विचार तक नहीं करते। महापुरुषों के संग के बिना, चाहे करोड़ों ही प्रयत्न क्यों न किये जायें, कुछ भी नहीं प्राप्त हो सकता और वह महापुरुषों का सत्संग भी श्रद्धा के बिना 'कृपालु' की राय से खिलवाड़ सा ही समझना चाहिए।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 136-137