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RADHEY RADHEY

सिद्धान्त-माधुरी · पद 96

लगति सखि अब ससुरारि पियारि।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: lagati sakhi aba sasurāri piyāri

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1लगति सखि अब ससुरारि पियारि।

2अब लौं रह अनजान पिया ते, रही उमरिया वारि।

3अब दिय रसिक बताय पिया तव, मोहन मदन मुरारि।

4अब न सुहात खेल गुड़ियन इन, दंपति पितु महतारि।

5अब सोइ नाम रूप गुन लीला, धाम जनहिं मन हारि।

6कह “कृपालु” जेहि चहत पिया बस, सोइ सुहागिनि नारि॥

हिन्दी भावार्थ

अरी सखि! अब तो ससुराल ही अच्छी लगती है। अब तक मैं अपने प्रियतम को नहीं जानती थी, मायाधीन होने के कारण अज्ञानी थी, किन्तु अब रसिकों ने बता दिया है कि तेरे प्रियतम एकमात्र मदन-मोहन श्यामसुन्दर ही हैं। अब स्त्री पति, माता पिता, आदि संसार के नातेदार गुड़ियों के खेल के समान प्रतीत होते हैं। अब तो प्रियतम श्यामसुन्दर के ही नाम रूप, लीला, गुण, धाम, जन में ही मन अनुरक्त रहता है। कृपालु, प्रेम भरी ईर्ष्या में कहते हैं जिसको पिया चाहे वही सुहागिन नारी है। तेरे ऊपर श्यामसुन्दर की कृपा हो गई क्योंकि तूने रसिकों की बात पर विश्वास कर लिया। कभी हमारा भी समय आयेगा।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 137