सिद्धान्त-माधुरी · पद 97
लगे नहिं सगे तोर भगवान।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: lage nahiṁ, sage tora bhagawāna
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1लगे नहिं सगे तोर भगवान।
2तू तो दास श्यामसुंदर को, सोइ स्वामी जिय जान।
3तेरो सखा सनातन सोई, मनमोहन मन मान।
4सोइ नँदलाल लाल है तेरो, तू पितु मातु समान।
5सोइ तेरो वल्लभ है जो हैं, वल्लभ ब्रज बनितान।
6सो राजा तू प्रजा"कृपालुहिं"भाव न भावत ध्यान॥
हिन्दी भावार्थ
एक तत्त्वज्ञ जीवात्मा से कहता है-षडैश्वर्य परिपूर्ण भगवान् से तेरा वास्तविक सम्बन्ध नहीं है, क्योकि वहाँ माधुर्य रस का अभाव है। तू तो श्यामसुन्दर का ही दास है अतएव तू उनको ही अपना स्वामी मान। तू श्यामसुन्दर का ही सनातन सखा है, तू उनको ही अपना सखा मान। तू श्यामसुन्दर का माता-पिता है तू उनको ही अपना पुत्र मान। तू ब्रजांगनाओं के प्रियतम की ही प्रेयसी है, तू उनको ही अपना प्रियतम मान। कृपालु' कहते हैं कि उपर्युक्त चारों भावों में ही माधुर्य-रस का आधिक्य है। शान्तभाव अर्थात् वे राजा हैं तू प्रजा है, यह भाव ऐश्वर्य सम्बन्धी होने के कारण रसिकों को प्रिय नहीं है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 138