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RADHEY RADHEY

सिद्धान्त-माधुरी · पद 92

रैन दिन झगरत नैनन प्रान।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: raina dina jhagarata nainana prāna

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1रैन दिन झगरत नैनन प्रान।

2प्रान कहत हौं जान चहत हौं, मिलन हेतु ढिग कान्ह।

3नैन कहत दै सैन एक छिन, परखु बात मम मान।

4एक बार दिखराय कमल मुख, पुनि तुम करहु पयान।

5भूलि गये दिन हमहिं मिलाये, सुंदर श्याम सुजान।

6वह दिन कब “कृपालु” आवे मोहिं, इक छिन कलप समान॥

हिन्दी भावार्थ

श्यामसुन्दर के वियोग में नयन एवं प्राण दिन रात परस्पर झगड़ा करते हैं। प्राण कहता है कि मैं श्याम मिलन के लिए अभी जाना चाहता हूँ। नयन संकेत करते हुए कहते हैं कि मेरी बात मानकर एक क्षण श्यामसुन्दर की प्रतीक्षा और कर लो। एक बार उनके मुखारविन्द की झाँकी दिखला कर फिर तुम चले जाना। तुम्हें वह दिन न भूलना चाहिये जब मैंने तुम्हें श्यामसुन्दर से मिलाया था। 'कृपालु' कहते हैं कि अरे नयन! वह क्षण कब आयेगा? मुझे तो श्यामसुन्दर के बिना एक-एक क्षण कल्प के समान प्रतीत हो रहाहै। क्षण कल्प के समान प्रतीत हो रहा है।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 134