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RADHEY RADHEY

सिद्धान्त-माधुरी · पद 91

रहो रे मन गौर चरन लव लाई।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: raho re mana! gaura charana lava lāī

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1रहो रे मन गौर चरन लव लाई।

2जिन चरनन की चरन रेनुकहिं, सेवत श्याम सदाई।

3जहँ जहँ चरन परत श्यामा को, तहँ तहँ सिर यदुराई।

4चरण पलोटत रज बिच लोटत, भूरि भाग्य जनु पाई।

5छिन छिन दृगन लगावत पुनि पुनि, चरनन उर लपटाई।

6तुम “कृपालु” कत रहे अभागे, इन चरनन बिसराई॥

हिन्दी भावार्थ

रे मन! युगल-अरुण चरणों से प्रेम कर, जिन चरणों की चरण-धूलि का ब्रह्म-श्रीकृष्ण भी सेवन करते हैं। के युगल-चरण पड़ते हैं; वहाँ-वहाँ यादवेन्द्र श्रीकृष्ण अपना शीश रखते हैं। उन्हीं चरणों को दबाने एवं उन्हीं चरणों की धूलि में लोटने में अपना परम भाग्य समझते हैं। उन्हीं चरणों को बार-बार अपने हृदय एवं अपने दोनों नेत्रं में लगाकर प्रेम-विभोर हो जाते हैं। हैं कि तुम इन अमूल्य किशोरी जी के चरणों को भुलाकर क्यों अभागे बने रहे।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 133-134