सिद्धान्त-माधुरी · पद 90
रहु श्री बरसाने गाम रे।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: rahu shrī barasāne gāma re
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1रहु श्री बरसाने गाम रे।
2जहाँ मुकुट सोँ देत बुहारी, पूर्ण ब्रह्म घनश्याम रे।
3जहाँ विटप बनि गावत मुनि जन, राधे राधे नाम रे।
4जहाँ नित्य एकत्व आदिहूँ, पांचहुँ मुक्ति गुलाम रे।
5जहाँ विहारिणि विहरति निशिदिन, सँग सिगरी ब्रजभाम रे।
6जहाँ “कृपालु” लाड़िली जू को, ब्रह्म पलोटत पाम रे॥
हिन्दी भावार्थ
अरे मन! चलकर श्री बरसाने ग्राम में निवास कर जहाँ पूर्णब्रह्म घनश्याम भी अपने मुकुट से झाड़ लगाया करते हैं। जहाँ बड़े-बड़े योगीन्द्र, मुनीन्द्र वृक्ष बनकर राधे राधे गाया करते हैं। जहाँ एकत्वादि पाँचों मुक्तियाँ दासता करती रहती हैं। जहाँ किशोरी जी ब्रजांगनाओं के साथ नित्य रास विहार करती रहती हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि जहाँ पूर्णत्रह श्यामसुन्दर स्वामिनी जी के चरण दबाया करते हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 133