सिद्धान्त-माधुरी · पद 89
रसिक जन गये फोरि सिर हार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: rasika-jana gaye phori sira hāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1रसिक जन गये फोरि सिर हार।
2यह जड़ जीव, अनादि-काल ते, निपट, कपट-आगार।
3जिन विषयन अनुभवत दुसह दुख, नेकु विराग न धार।
4पुनि जिन विषयन नहिं कछु अनुभव, किमि समुझिय संसार।
5मिट्यो न जग यद्यपि हरि हरिजन, प्रकटे अगनित बार।
6दोष “कृपालु” सुभायन को जो, कर नित पर उपकार॥
हिन्दी भावार्थ
बड़े बड़े महापुरुष मत्थापच्ची करके थक गये किन्तु फिर भी यह अनादि-काल का दुष्ट, हठी जीव नहीं समझ सका। जिन सांसारिक विषयों का जीव प्रतिक्षण अनुभव करता है तथा कहता भी है कि संसार में घोर दुःख ही दुःख है फिर भी जब उन्हीं से आज तक विरक्त नहीं हो सका, तब फिर जिन भगवत्-विषयों का जीव को अभी तक कुछ भी आनन्द नहीं प्राप्त हुआ, उन बुद्धि-अतीत विषयों को जीव म समझ सकता है? यद्यपि भगवान एवं बड़े-बड़े महापुरुष अनन्त बार इस पृथ्वी पर अवतार ले-लेकर जीवों के उद्धार के लिए आये और फिर भी यह संसार यथावत् बना ही रहा, कुछ इने-गिने जीव मायातीत हो पाये। 'कृपालु' कहते हैं कि यह सब कुछ समझते-बूझते हुए भी सरल स्वभाववश परोपकार निरत महापुरुष जीव के कल्याण के लिए तन, मन, धन से प्रयत्न करता ही है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 132