सिद्धान्त-माधुरी · पद 88
रटो रे मन! छिन छिन श्यामा श्याम।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: raṭo re mana! chhina-chhina shyāmā-shyāma
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1रटो रे मन! छिन छिन श्यामा श्याम।
2सद्घन चिद्घन आनंदघन जो, रूप एक द्वै नाम।
3जासु नाम शिव शुक सनकादिक, गावत आठों याम।
4जाकी लीला लखन ज्ञानिजन, बने विटप ब्रजधाम।
5जासु धाम विधि ब्रज-रज याचत, ठड़े एक ही पाम।
6जिन “कृपालु” गुन सुनि शुक से मुनि, तजत समाधि ललाम॥
हिन्दी भावार्थ
अरे मन! 'श्यामा-श्याम'इस युगल नाम को प्रत्येक क्षण रटता रह। यह श्यामा-श्याम सच्चिदानन्द ब्रह्म के ही दो अभिन्न स्वरूप हैं। अरे मन, इनके नाम को शिव, शुक, सनकादि भी निरन्तर गाते रहते हैं। इनकी लीला को देखने के लिये ज्ञानी लोग भी ब्रज में वृक्षों का शरीर धारण करते हैं इनके धाम की धूलि को ब्रह्मा सरीखे एक पैर से खड़े होकर माँगते रहते हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि इन्हीं युगल सरकार पु व, पड अ र गुणों को सुनकर शुकदेव सरीखे परमहंस भी अपनी निर्विकल्प समाधि छोड़ देते हैं एवं वेदव्यास से श्रीमद्भागवत का श्रवण करते हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 131-132