सिद्धान्त-माधुरी · पद 87
रटो रे मन! छिन छिन राधे नाम।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: raṭo re mana! chhina–chhina rādhe nāma
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1रटो रे मन! छिन छिन राधे नाम।
2ब्रह्मादिक की कौन बात जेहि, रटत ब्रह्म घनश्याम।
3जेहि रटि महारास-रस पायो, शंकर धरि तनु बाम।
4निगम-अगम निधि रसिकन दीनी, बिनुहिं मोल बिनु दाम।
5राधे नाम पुकारत आरत, भाजति तजि निज धाम।
6मिल्यो"कृपालुहिं"रतन अमोलक, कहा जगत सों काम॥
हिन्दी भावार्थ
हे मन! क्षण-क्षण निरन्तर प्रेमपूर्वक राधे नाम का संकीर्तन कर। जिस राधे नाम को ब्रह्मा, विष्णु आदि की कौन कहे स्वयं साक्षात् ब्रह्म-श्रीकृष्ण भी रटा करते हैं तथा जिस राधे नाम को रटकर भगवान् शंकर ने गोपी शरीर धारण करके द्वापर में महारास का रस प्राप्त किया। वेदों में भी अप्राप्य इस राधे नाम की निधि को महापुरुषों ने अकारण कृपा से बिना प्रयास के ही प्रदान कर दिया। भक्त के आर्त-भावयुक्त राधे नाम पुकारते ही किशोरी जी अपना लोक छोड़कर अत्यंत व्याकुल होकर भागती हुई उसके पास चली आती हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि यह राधे नाम रूपी अमूल्य रत्न मुझे तो रसिकों की कृपा से मिल गया है, फिर संसार से क्या काम?
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 130-131