# रटो रे मन! छिन छिन राधे नाम।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0096-M03-K087
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: सिद्धान्त-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 87
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 45–46

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>रटो रे मन! छिन छिन राधे नाम।  
<a id="line-2"></a>ब्रह्मादिक की कौन बात जेहि, रटत ब्रह्म घनश्याम।  
<a id="line-3"></a>जेहि रटि महारास-रस पायो, शंकर धरि तनु बाम।  
<a id="line-4"></a>निगम-अगम निधि रसिकन दीनी, बिनुहिं मोल बिनु दाम।  
<a id="line-5"></a>राधे नाम पुकारत आरत, भाजति तजि निज धाम।  
<a id="line-6"></a>मिल्यो"कृपालुहिं"रतन अमोलक, कहा जगत सों काम॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

हे मन! क्षण-क्षण निरन्तर प्रेमपूर्वक राधे नाम का संकीर्तन कर। जिस राधे नाम को ब्रह्मा, विष्णु आदि की कौन कहे स्वयं साक्षात् ब्रह्म-श्रीकृष्ण भी रटा करते हैं तथा जिस राधे नाम को रटकर भगवान् शंकर ने गोपी शरीर धारण करके द्वापर में महारास का रस प्राप्त किया। वेदों में भी अप्राप्य इस राधे नाम की निधि को महापुरुषों ने अकारण कृपा से बिना प्रयास के ही प्रदान कर दिया। भक्त के आर्त-भावयुक्त राधे नाम पुकारते ही किशोरी जी अपना लोक छोड़कर अत्यंत व्याकुल होकर भागती हुई उसके पास चली आती हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि यह राधे नाम रूपी अमूल्य रत्न मुझे तो रसिकों की कृपा से मिल गया है, फिर संसार से क्या काम?

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 130-131

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
