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RADHEY RADHEY

सिद्धान्त-माधुरी · पद 74

मन! तू काहे हठ पकर्यो।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: mana! tū kāhe haṭha pakaryo?

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1मन! तू काहे हठ पकर्यो।

2तू निज विषय रूप लीलादिक, हित नित जगत अर्यो।

3सपनेहुँ तृप्त भयो नहिं नेकहुँ, पचि पचि वृथहिं मर्यो।

4हौं दैहौं तोहिं दिव्य विषय सब, बनि जैहैं बिगर्यो।

5पुनि सो रस तजि भाजि सकत नहिं, प्रेम रज्जु जकर्यो।

6अबहूँ चेत “कृपालु” आजु लौं, जो कछु कर्यो कर्यो॥

हिन्दी भावार्थ

हे मन! तूने व्यर्थ ही क्यों दुराग्रह ठान रखा है? तू अपनी इंद्रियों के विषय शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध आदि के ही निमित्त अनादिकाल से प्रतिक्षण इस संसार में भटक रहा है। व्यर्थ ही इतना घोर परिश्रम करते हुए भी तुझे स्वप्न में भी थोड़ी सी भी शांति नहीं प्राप्त हुई। यदि तू मेरी बात माने, एवं मेरा विश्वास करे तो चल, राधा-कृष्ण के पास, तुझे इन्हीं इंद्रियों के अति दिव्य विषय, जिनको पाकर तू सदा के लिए तृप्त हो जाय, दिला दूँ, एवं मेरी भी अनादिकाल की बन जाये। रे मन! उस दिव्य रस को पाकर तू कहीं भी स्वप्न में भी जाने की इच्छा न कर सकेगा। वरन् उसी प्रेम-पाश में नित्य ही बँधकर विभोर रहेगा। 'कृपालु' कहते हैं कि-हे मन! आज तक जो कुछ तूने किया सो किया, अब भी सावधान हो जा अर्थात् श्यामा-श्याम की शरण चला जा।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 119