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RADHEY RADHEY

सिद्धान्त-माधुरी · पद 75

माई री मैं तो! आजु परी निधि पाई।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: māī rī maiṁ to, āju parī nidhi pāī

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1माई री मैं तो! आजु परी निधि पाई।

2जेहि खोजत मोहिं युग युग बीत्यो, पर्यो न कतहुँ लखाई।

3तेहि मोहिं साधनहीन जानि के, रसिकन दई बताई।

4पारस लहि बौरात रंक ज्यों, त्यों हौं गई बौराई।

5भरी गुमान रैन दिन डोलति, करति सदा मनभाई।

6सो “कृपालु” बिनु मोल मिलत निधि, राधे नाम सदाई॥

हिन्दी भावार्थ

अरी माई! मुझे तो आज बिना परिश्रम के ही पड़ा हुआ खजाना मिल गया। जिस निधि को खोजते हुए मुझे अनंतानंत जन्म बीत गये फिर भी जो कहीं नहीं प्राप्त हुई रसिकों ने मुझे समस्त साधनाओं से हीन समझ कर उसे बता दिया। जिस प्रकार एक भिखारी सहसा पारस पा जाने पर पागल हो जाता है, उसी प्रकार मैं भी उस निधि को पाकर उन्मत्त सी हो गयी। अब मैं बड़े ही गर्व के साथ, किसी की परवाह न करते हुये, दिन रात विचरा करती हूँ तथा अनादिकाल से अपूर्ण इच्छाओं को पूर्ण कर रही हूँ.। 'कृपालु' कहते हैं कि वह निधि 'राधे'नाम की है एवं रसिकों की कृपा से सर्वत्र ही प्राप्त है।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 119-120