सिद्धान्त-माधुरी · पद 76
मान मन! छाड़ु मान अपमान।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: māna mana! chhāṁd̤u māna apamāna
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1मान मन! छाड़ु मान अपमान।
2जब लौं मिल्यो न तोहिं प्राणधन, सुंदर श्याम सुजान।
3तब लौं कहा मान निज मानत, मायाधीन अयान।
4मायाधीन मलीन जीव कहँ, सकल दोषमय जान।
5कोउ सदोष कहँ कह सदोष तो, बुरो वाय कत मान।
6जो निर्दोष सदोष कहे तो, दोष रोष कत आन।
7कह “कृपालु” बनि दीन तृणहुँ ते, रुदन करहु धरि ध्यान॥
हिन्दी भावार्थ
अरे मन! मेरी बात मान ले। मानापमान के झगड़े में न पड़। जरा सोच तो, जब तक तुझे प्रियतम श्यामसुन्दर नहीं मिले, तब तक तू अवश्यमेव मायाधीन ही रहेगा, और मायाधीन में समस्त दोषों का निवास सर्वदा ही रहता है, फिर तू किस बात पर मान चाहता है? वास्तविक मान का अभिमान तभी सत्य है, जब श्यामसुन्दर का मिलन हो जाय। इस प्रकार मायाधीन होने के कारण यदि सदोष को कोई भी व्यक्ति सदोष कहता है तो उसे बुरा मानना कितना बड़ा अज्ञान है, जबकि संसार में 'सूरदास'कहने पर कोई भी अन्धा बुरा नहीं मानता। यदि तू कहता है मैं निर्दोष हूँ तो सदोष कहने मात्र से क्रोध का दोष हृदय में क्यों आ जाता है? 'कृपालु' कहते हैं कि अब तू तृण से भी अधिक दीन बनकर श्यामसुन्दर का रूपध्यान करते हुए बालवत् भोला बनकर रुदन कर मानापमान की तब तक न सोच जब तक श्यामसुन्दर न मिल जायेँ।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 120-121