सिद्धान्त-माधुरी · पद 77
मिलत नहिं नर तनु बारम्बार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: milata nahiṁ nara tanu bārambāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1मिलत नहिं नर तनु बारम्बार।
2कबहुँक करि करुणा करुणाकर, दे नृदेह संसार।
3उलटो टाँगि बाँधि मुख गर्भहिं, समुझायेहु जग सार।
4दीन ज्ञान जब कीन प्रतिज्ञा, भजिहौं नंदकुमार।
5भूलि गयो सो दशा भई पुनि, ज्यों रहि गर्भ मझार।
6यह “कृपालु” नर तनु सुरदुर्लभ, सुमिरु श्याम सरकार॥
हिन्दी भावार्थ
यह मनुष्य का शरीर बार-बार नहीं मिलता। दयामय भगवान् चौरासी लाख योनियों में भटकने के पश्चात् दया करके कभी मानव देह प्रदान करते हैं। मानव देह देने के पूर्व ही संसार के वास्तविक स्वरूप का परिचय कराने के लिए गर्भ में उल्टा टाँग कर मुख तक बाँध देते हैं। जब गर्भ में बालक के लिये कष्ट असह्य हो जाता है तब उसे ज्ञान देते हैं और वह प्रतिज्ञा करता है कि मुझे गर्भ से, बाहर निकाल दीजिये मैं केवल आपका ही भजन करूँगा। जन्म के पश्चात् जो श्यामसुन्दर को भूल जाता है, उसकी वर्तमान जीवन में भी गर्भस्थ अवस्था के समान ही दयनीय दशा हो जाती है। कृपालु कहते हैं कि यह मानव देह देवताओं के लिये भी दुर्लभ है इसीलिये सावधान हो कर श्यामसुन्दर का स्मरण करो।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 121-122