सिद्धान्त-माधुरी · पद 78
मूढ़ मन! गूढ़ तत्व यह जान।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: mūd̤ha mana! gūd̤ha tatva yaha jāna
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1मूढ़ मन! गूढ़ तत्व यह जान।
2इक ईश्वर इक जीव और इक, माया तत्वहिं मान।
3चिदानंदमय ईश्वर जाको, किंकर जीव बखान।
4देही जीवहिं देह मान बस, यह अनादि अज्ञान।
5जो जितनोइ यह जान मान सो, तितनोइ यह पहिचान।
6जितनोइ मान प्रीति तिन तितनोइ, चरनन श्याम सुजान।
7कह “कृपालु” मन तजि मनमानी, धरु मनमोहन ध्यान॥
हिन्दी भावार्थ
अरे मूर्ख मन! इस परम अन्तरंग तत्त्वज्ञान को समझ ले। तीन तत्त्व नित्य हैं-पहला ईश्वर, दूसरा जीव, एवं तीसरा तत्त्व माया। इनमें माया चिदानन्दमय ईश्वर की जड़ शक्ति है एवं जीव चिदानन्दमय ईश्वर का सनातन दास है जिसे वेदादिकों में अंश शब्द से विहित किया गया है। जीवात्मा देही है तू उसको देह मान रहा है, बस यही अनादिकालीन तेरा आज्ञान है। जो इस बात को जितना जान लेता है, उतना ही उस पर विश्वास भी कर लेता है, उसके जानने की यही पहिचान है। पुनः जो जितनी मात्रा में उपर्युक्त बात पर विश्वास कर लेता है उतनी ही मात्रा में अपने आप उसका श्यामसुन्दर के चरणों में अनुराग हो जाता है। 'कृपालु' कहते हैं-अरे मन! अब मनमानी छोड़ दे, एवं मनमोहन में रूपध्यान द्वारा अपने आप को अनुरक्त कर।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 122-123