सिद्धान्त-माधुरी · पद 79
मेरो मन गौर चरन अनुराग्यो।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: mero mana gaura charana anurāgyo
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1मेरो मन गौर चरन अनुराग्यो।
2सोवत रह्यो अनादि काल ते, रसिक कृपा ते जाग्यो।
3मिट्यो स्वप्न संसार आपुहीं, मोह तिमिर सब भाग्यो।
4बिनु अष्टांग योग साधे ही, चित्त प्रेम रस पाग्यो।
5छुटत न कोटि मुक्ति सुख पाये, जेहि मुख यह रस लाग्यो।
6भयो “कृपालु” धनी सब दिन को, मिल्यो रतन मुहँ माँग्यो॥
हिन्दी भावार्थ
मेरा मन तो किशोरी जी के चरणों में अनुरक्त हो गया है। मैं अनादि काल से मोह की नींद में सो रहा था रसिकों ने मुझे जगा दिया है। जागते ही मेरा स्वप्नवत् संसार अपने-आप समाप्त हो गया है एवं आज्ञानरूपी अन्धकार का सर्वथा नाश हो गया है। मेरा मन तो बिना अष्टांग-योग साधना किये ही प्रेमरस में अनुरक्त हो गया है। यह रस एक बार भी जिसके मुँह लग जाता है, फिर उसे इस रस से करोड़ों मुक्तियों का सुख भी पृथक् नहीं कर सकता। 'कृपालु' कहते हैं कि मुझे तो मुँह -माँगा धन मिल गया तथा मैं सदा के लिए मालामाल हो गया।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 123