सिद्धान्त-माधुरी · पद 80
मोहिं मनमोहन मनभाय रे।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: mohiṁ manamohana mana bhāya re
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1मोहिं मनमोहन मनभाय रे।
2कोउ कर जप कोउ तप कोउ व्रत कोउ, विपिन समाधि लगाय रे।
3कोउ कर तीरथ चारिधाम कोउ, मरने काशी जाय रे।
4कोउ पट गेरुआ कोउ केशरिया, रँग अनेक रँगाय रे।
5कोउ बिंदी, कोउ खड़ा तिलक कोउ, भस्म ललाट लगाय रे।
6काम “कृपालु” तबै बनिहैं जब, हरि चरनन मन लाय रे॥
हिन्दी भावार्थ
मेरे मन को तो श्यामसुन्दर ही भा गये। कोई तप और कोई उपवास करता है। लगाता है, कोई चारों धाम तीर्थ करने जाता है, कोई काशी में मरने जाते हैं। कोई रँग-रँग कर गेरुआ और कोई केशरिया वस्त्र पहनते हैं। लगाता है, कोई ललाट में भस्म लगाता है। कि यह सब भोलापन है। लगाये बिना केवल उपरोक्त क्रियाओं से काम नहीं बन सकता।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 124