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RADHEY RADHEY

सिद्धान्त-माधुरी · पद 81

यह जग सेमर का फूल रे।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: yaha jaga semara kā phūla re!

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1यह जग सेमर का फूल रे।

2मारि चोंच लखि रुई सुवा तहँ, मानत आपन भूल रे।

3तू मन छिन छिन खात लात पै, रहत विषय महँ झूल रे।

4यह नर तन छनभंगुर मन! ज्यों, तरुवर सरिता-कूल रे।

5सुत दारा धन पाइ फूल जनि, इन कहँ जान त्रिशूल रे।

6सुनु “कृपालु” यह मूलमंत्र हरि, भजु भावन अनुकूल रे॥

हिन्दी भावार्थ

अरे मन! यह संसार सेमर के फूल के समान भ्रांतिजनक है। सुआ तो सेमर के, फूल में चोंच मारकर जब रुई देख लेता है तब अपनी भूल को स्वीकार कर लेता है। किंतु अरे मन! तू प्रत्येक क्षण जूते लात खाते हुए भी उन्हीं विषयों में अनुरक्त है। अरे मन! यह मनुष्य का शरीर नदी के किनारे के वृक्ष के समान क्षणभंगुर है। पुत्र, स्त्री, धन इन तीनों को पाकर तू क्यों फूला-फूला घूम रहा है। ये तीनों तो लिशूल के समान तुझे कष्ट दे रहे हैं 'कृपालु' कहते हैं कि अरे मन! यही मूलमंत्र है कि शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य एवं माधुर्य इन पाँच अनुकूल भावों से श्यामसुन्दर का निरन्तर स्मरण कर।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 124-125