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RADHEY RADHEY

सिद्धान्त-माधुरी · पद 82

यह जोरी नीकी जान रे।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: yaha jorī nīkī jāna re

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1यह जोरी नीकी जान रे।

2यह मन अरु वह मनमोहन दोउ, दीखत एक समान रे।

3इत कह मन अति चंचल वाको, वेग वायु बलवान रे।

4उत चंचलताहूँ ते चंचल, सुंदर श्याम सुजान रे।

5इत कारो मन जनम कोटि के, पापन, संत बखान रे।

6उत “कृपालु” कारो हरि पुनि कत, धरत न मन! उन ध्यान रे॥

हिन्दी भावार्थ

यह युगल जोड़ी कितनी अच्छी है। अरे मन! तेरी एवं मनमोहन की सभी बातें एक सी हैं। तेरा भी वेग वायु से बढ़कर है, उधर श्यामसुन्दर भी चंचलता से भी अधिक चंचल हैं। महापुरुषों के कथनानुसार इधर तू भी करोड़ों जन्मों के पापों से काला है। 'कृपालु' कहते हैं कि उधर श्यामसुन्दर भी काले हैं। फिर भी अरे मन!

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 125-127