सिद्धान्त-माधुरी · पद 83
यह माया ठगिनी जान रे।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: yaha māyā ṭhaginī jāna re!
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1यह माया ठगिनी जान रे।
2याते विधि हरि हर सब डरपत, यह अतिशय बलवान रे।
3विश्वामित्र पराशर से मुनि, माया माहिं भुलान रे।
4येहि नहिं मिथ्या तत्व मान मन, शक्ति जान भगवान रे।
5बिनु हरि कृपा जाति नहिं कैसेहुँ, साधन कियेहु महान रे।
6पै “कृपालु” हरि कृपा होय तब, जब भजु श्याम सुजान रे॥
हिन्दी भावार्थ
अरे मन! इस माया को तू बहुत बड़ी ठगिनी जान। इससे विष्णु, शंकर भी डरते हैं। यह अबला अत्यंत प्रबला है। विश्वामित्र एवं पराशर सरीखे मुनि को भी इस माया ने चक्कर में डाल दिया। अरे मन! यह माया मिथ्या तत्त्व नहीं है अपितु भगवान् की शक्ति एवं दासी है। करोड़ों साधन करने पर भी बिना भगवान् की कृपा के यह माया किसी प्रकार भी नहीं जा सकती। 'कृपालु' कहते हैं किंतु श्यामसुन्दर की कृपा तभी होगी जब तुम निष्कपट भाव से निरन्तर उनका भजन करोगे।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 128