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RADHEY RADHEY

सिद्धान्त-माधुरी · पद 84

येहि जग की आशा छोड़ रे।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: yehi jaga kī āshā chhod̤a re!

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1येहि जग की आशा छोड़ रे।

2मात पिता भगिनी सुत दारा, नातेदार करोड़ रे।

3मीठी बात बनाय भुरावत, इन से नाता तोड़ रे।

4बाढ़ति विषय-वासना छिन-छिन, दे इंद्रिन घट फोड़ रे।

5सात स्वर्ग अपवर्ग पाँच ते, ले अपुनो मुख मोड़ रे।

6सुनु “कृपालु” मन परम सनेही, हरि सों नाता जोड़ रे॥

हिन्दी भावार्थ

अरे मन! तू संसार की आशा छोड़ दे। माता, पिता बहिन, पुत्र, स्त्री आदि करोड़ों नातेदार हैं, जो मीठी-मीठी बातें बनाकर तुझे भुलावे में डाल रहे हैं। तू इनसे सम्बन्ध तोड़ दे। निरन्तर विषयों की सामग्री देने पर भी वासनाएँ बढ़ती जा रही हैं। अतएव इन इन्द्रियों के घड़े फोड़ दे अर्थात् सांसारिक इच्छाओं को बनाना बन्द कर दे, सातौं स्वर्ग एवं पाँचों मोक्ष से अपना मुख मोड़ ले। 'कृपालु' कहते हैं कि अरे मन! तू, एकमात्र परम सनेही श्यामसुन्दर से ही हार्दिक सम्बन्ध स्थापित कर।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 128-129