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RADHEY RADHEY

सिद्धान्त-माधुरी · पद 85

येहि जग मृगजल ज्योँ जान रे।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: yehi jaga mṛigajala jyoṁ jāna re

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1येहि जग मृगजल ज्योँ जान रे।

2निशिदिन पियत मृगन मृगजल ज्योँ, नेकु न प्यास बुझान रे।

3त्यों इंद्रिन विषयन महँ निज सुख, खोजत यह अज्ञान रे।

4प्यास बुझाय सके नहिं इंद्रिन, सुरपति इन्द्र समान रे।

5तब तेरी बिसात का मूरख, अबहुँ बात ले मान रे।

6भजहु “कृपालु” रैन दिन छिन-छिन, सुंदर श्याम सुजान रे॥

हिन्दी भावार्थ

अरे मन! तू संसार को मृगजल के समान समझ जैसे हिरन मरुस्थल में उड़ते हुए बालू के कणों को जल समझकर दौड़ता है किन्तु थोड़ी भी प्यास नहीं बुझती बरन प्यास बढ़ती ही जाती है, उसी प्रकार तू भी इन इन्द्रियों वे विषयों के द्वारा परमानन्द चाहता है। यह तेरी बहुत बड़ी भूल है। इन इन्द्रियों को उनके विषय देकर देवराज इन्द्र भी इन्हे तृप्त नहीं कर सके, तब तेरी क्या हैसियत है? इसलिये अब भी मेरी बात मान ले। 'कृपालु' कहते हैं कि निरन्तर श्यामसुन्द का भजन कर।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 129