# यह जग सेमर का फूल रे।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0090-M03-K081
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: सिद्धान्त-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 81
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 43–43

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>यह जग सेमर का फूल रे।  
<a id="line-2"></a>मारि चोंच लखि रुई सुवा तहँ, मानत आपन भूल रे।  
<a id="line-3"></a>तू मन छिन छिन खात लात पै, रहत विषय महँ झूल रे।  
<a id="line-4"></a>यह नर तन छनभंगुर मन! ज्यों, तरुवर सरिता-कूल रे।  
<a id="line-5"></a>सुत दारा धन पाइ फूल जनि, इन कहँ जान त्रिशूल रे।  
<a id="line-6"></a>सुनु “कृपालु” यह मूलमंत्र हरि, भजु भावन अनुकूल रे॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

अरे मन! यह संसार सेमर के फूल के समान भ्रांतिजनक है। सुआ तो सेमर के, फूल में चोंच मारकर जब रुई देख लेता है तब अपनी भूल को स्वीकार कर लेता है। किंतु अरे मन! तू प्रत्येक क्षण जूते लात खाते हुए भी उन्हीं विषयों में अनुरक्त है। अरे मन! यह मनुष्य का शरीर नदी के किनारे के वृक्ष के समान क्षणभंगुर है। पुत्र, स्त्री, धन इन तीनों को पाकर तू क्यों फूला-फूला घूम रहा है। ये तीनों तो लिशूल के समान तुझे कष्ट दे रहे हैं 'कृपालु' कहते हैं कि अरे मन! यही मूलमंत्र है कि शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य एवं माधुर्य इन पाँच अनुकूल भावों से श्यामसुन्दर का निरन्तर स्मरण कर।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 124-125

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
