# मन! तू काहे हठ पकर्यो।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0083-M03-K074
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: सिद्धान्त-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 74
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 40–40

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>मन! तू काहे हठ पकर्यो।  
<a id="line-2"></a>तू निज विषय रूप लीलादिक, हित नित जगत अर्यो।  
<a id="line-3"></a>सपनेहुँ तृप्त भयो नहिं नेकहुँ, पचि पचि वृथहिं मर्यो।  
<a id="line-4"></a>हौं दैहौं तोहिं दिव्य विषय सब, बनि जैहैं बिगर्यो।  
<a id="line-5"></a>पुनि सो रस तजि भाजि सकत नहिं, प्रेम रज्जु जकर्यो।  
<a id="line-6"></a>अबहूँ चेत “कृपालु” आजु लौं, जो कछु कर्यो कर्यो॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

हे मन! तूने व्यर्थ ही क्यों दुराग्रह ठान रखा है? तू अपनी इंद्रियों के विषय शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध आदि के ही निमित्त अनादिकाल से प्रतिक्षण इस संसार में भटक रहा है। व्यर्थ ही इतना घोर परिश्रम करते हुए भी तुझे स्वप्न में भी थोड़ी सी भी शांति नहीं प्राप्त हुई। यदि तू मेरी बात माने, एवं मेरा विश्वास करे तो चल, राधा-कृष्ण के पास, तुझे इन्हीं इंद्रियों के अति दिव्य विषय, जिनको पाकर तू सदा के लिए तृप्त हो जाय, दिला दूँ, एवं मेरी भी अनादिकाल की बन जाये। रे मन! उस दिव्य रस को पाकर तू कहीं भी स्वप्न में भी जाने की इच्छा न कर सकेगा। वरन् उसी प्रेम-पाश में नित्य ही बँधकर विभोर रहेगा। 'कृपालु' कहते हैं कि-हे मन! आज तक जो कुछ तूने किया सो किया, अब भी सावधान हो जा अर्थात् श्यामा-श्याम की शरण चला जा।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 119

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
