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RADHEY RADHEY

सिद्धान्त-माधुरी · पद 73

मन! क्यों नहिं हरि गुन गा रहा।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: mana! kyoṁ nahiṁ hari guna gā rahā

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1मन! क्यों नहिं हरि गुन गा रहा।

2यह जग है इक भूलभुलैया, क्यों तू धोखा खा रहा।

3भुक्ति मुक्ति हैं प्रबल पिशाचिनि, क्यों इनमें भरमा रहा।

4सुत वित नारिन त्रिविध तिजारिन, क्योँ इनको अपना रहा।

5इन इंद्रिन विषयन-विष पी मन, क्यों इतनो हरषा रहा।

6नर तनु पाय “कृपालु” भजन करु, यह जीवन अब जा रहा॥

हिन्दी भावार्थ

अरे मन! तू श्यामसुन्दर का गुणगान क्यों नहीं करता? इस भूल भूलैया के खेल वाले संसार में तू क्यों धोखा खा रहा है? मुक्ति एवं भुक्ति ये दोनों अत्यन्त प्रबल चुड़ेलें हैं तू इनके चक्कर में क्यों आ रहा है। तिजारी के समान हैं। तू इनको क्यों अपना रहा है? के विषयों को पीकर तू क्यों इतना सुख मान रहा है? कहते हैं कि यह मनुष्य का शरीर देवताओं को भी दुर्लभ है। यह चार दिन का जीवन जा रहा है, अतएव शीघ्र ही श्यामसुन्दर का भजन कर।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 118