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RADHEY RADHEY

सिद्धान्त-माधुरी · पद 72

मन! काहे करत गुमान रे।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: mana! kāhe karata gumāna re!

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1मन! काहे करत गुमान रे।

2असुर भयो इक हिरणकशिपु मन, तीन लोक बलवान रे।

3तिनहुँ गुमान मिटायो छन महँ, प्रकटि खंभ भगवान रे।

4असुर भयो दूजो रावण मन, जेहि विधि हरि डरपान रे।

5तिनहुँ गुमान मिटायो छन महँ, मारि तानि इक बान रे।

6अबहूँ चेत “कृपालु” मूढ़ मन, भज नँदनंदन कान्ह रे॥

हिन्दी भावार्थ

अरे मन! तू क्यों अहंकार करता है। सतयुग में तीनों लोक में बलवान हिरण्यकशिपु नाम का एक राक्षस हुआ था जिसके अहंकार को भी भगवान् नृसिंह ने खम्भ से प्रकट होकर एक क्षण में चूर्ण कर दिया। त्रेता में रावण नाम का एक राक्षस हुआ था जिससे ब्रह्मा, विष्णु भी डरते थे। उसके अहंकार को भी भगवान् राम ने एक बाण मारकर क्षण भर में चूर्ण कर दिया। 'कृपालु' कहते हैं कि अरे मूर्ख मन! अब भी होश में आ जा एवं श्यामसुन्दर का निरन्तर भजन कर ले।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 116-118