सिद्धान्त-माधुरी · पद 23
अरे मन! सुन सूधी-सी बात।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: are mana! suna sūdhī-sī-bāta
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1अरे मन! सुन सूधी-सी बात।
2तू अपनी स्वामिनि आत्महिं हित, करत कर्म दिन रात।
3पै आत्महिं-हित, परमात्महिं नित, यह कत नहिं पतियात।
4जग-वैभव मायाभव यामें, सुख-दुख कछु नहिं तात।
5पुनि येहि दै चह परमात्महिं-सुख, कत इतनो बौरात।
6तजु “कृपालु” हठ भज मन निशि-दिन, सुंदर श्यामलगात॥
हिन्दी भावार्थ
अरे मन! सीधी सी बात सुन। तू आत्मा का दास है अतएव प्रतिक्षण अपनी स्वामिनी आत्मा के सुख के लिए ही कर्म करता रहता है। किन्तु यह नहीं जानता कि जिस प्रकार तू आत्मा का नित्य दास है, उसी प्रकार आत्मा भी परमात्मा का नित्य दास है। अतएव आत्मा का सुख एक मात्र परमात्मा में ही है। संसार के समस्त ऐश्वर्य माया से बने हैं, अतएव इनमें सुख या दुःख कुछ भी नहीं है। फिर तू उन मायिक ऐश्वर्य को देखकर परमात्मा सम्बन्धी नित्य सुख चाहता है, इससे बड़ा पागलपन और क्या हो सकता है? 'कृपालु' कहते हैं- अरे मन! अब हठ छोड़ दे एवं श्यामसुन्दर का निरन्तर भजन कर।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 78-79