# अरे मन! सुन सूधी-सी बात।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0032-M03-K023
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: सिद्धान्त-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 23
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 18–18

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>अरे मन! सुन सूधी-सी बात।  
<a id="line-2"></a>तू अपनी स्वामिनि आत्महिं हित, करत कर्म दिन रात।  
<a id="line-3"></a>पै आत्महिं-हित, परमात्महिं नित, यह कत नहिं पतियात।  
<a id="line-4"></a>जग-वैभव मायाभव यामें, सुख-दुख कछु नहिं तात।  
<a id="line-5"></a>पुनि येहि दै चह परमात्महिं-सुख, कत इतनो बौरात।  
<a id="line-6"></a>तजु “कृपालु” हठ भज मन निशि-दिन, सुंदर श्यामलगात॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

अरे मन! सीधी सी बात सुन। तू आत्मा का दास है अतएव प्रतिक्षण अपनी स्वामिनी आत्मा के सुख के लिए ही कर्म करता रहता है। किन्तु यह नहीं जानता कि जिस प्रकार तू आत्मा का नित्य दास है, उसी प्रकार आत्मा भी परमात्मा का नित्य दास है। अतएव आत्मा का सुख एक मात्र परमात्मा में ही है। संसार के समस्त ऐश्वर्य माया से बने हैं, अतएव इनमें सुख या दुःख कुछ भी नहीं है। फिर तू उन मायिक ऐश्वर्य को देखकर परमात्मा सम्बन्धी नित्य सुख चाहता है, इससे बड़ा पागलपन और क्या हो सकता है? 'कृपालु' कहते हैं- अरे मन! अब हठ छोड़ दे एवं श्यामसुन्दर का निरन्तर भजन कर।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 78-79

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

- [आधिकारिक पूर्ण साहित्य संग्रह](https://www.jkpliterature.org.in/)
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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
