सिद्धान्त-माधुरी · पद 24
अरे मन! हरि, हरिजन नहिं दोय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: are mana! hari, harijana nahiṁ doya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1अरे मन! हरि, हरिजन नहिं दोय।
2जहँ हरि तहँ हरिजन, जहँ हरिजन, तहँ हरि विलग न होय।
3दोऊ रहत दास दोउन को, मरम न जाने कोय।
4दोउ कर पर उपकार निरंतर, पतितन-मन मल धोय।
5जल, तरंग दोउ नाम उपाधी, वस्तुतस्तु इक सोय।
6पै “कृपालु” हरिजन रूपी हरि, ही सों स्वारथ तोय॥
हिन्दी भावार्थ
हे मन! श्री कृष्ण एवं उनके भक्त वस्तुतः पृथक् नहीं हैं। जहाँ श्रीकृष्ण रहते हैं वहीं भक्त रहते हैं, एवं जहाँ भक्त रहते हैं वहीं श्रीकृष्ण रहते हैं। ये दोनों एक दूसरे से पृथक् किसी भी काल में हो ही नहीं सकते। मयि ते तेषु चाप्यहम्''(गीता) श्रीकृष्ण एवं उनके भक्त एक दूसरे को प्रसन्न करते हुए एक दूसरे के भक्त बने रहते हैं। क रहस्य को बड़े-बड़े विद्वान् भी नहीं समझ पाते हैं। दोनों ही निरन्तर परोपकार की भावना से सांसारिक पतित जीवों के मन के महान् से महान् पापों को धोया करते हैं। जैसे जल एव तरंग ये दोनों नाम औपाधिक रूप से ही हैं, वास्तव में दोनों ही नाम एक ही वस्तु के हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि-यद्यपि दोनो एक हैं फिर भी तुझे तो भक्त रूपी भगवान् से ही काम है भगवान् रूपी भक्त तो भक्ति प्राप्त होने के बाद ही काम आयेंगे।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 79