# अरे मन! हरि, हरिजन नहिं दोय।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0033-M03-K024
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: सिद्धान्त-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 24
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 19–19

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>अरे मन! हरि, हरिजन नहिं दोय।  
<a id="line-2"></a>जहँ हरि तहँ हरिजन, जहँ हरिजन, तहँ हरि विलग न होय।  
<a id="line-3"></a>दोऊ रहत दास दोउन को, मरम न जाने कोय।  
<a id="line-4"></a>दोउ कर पर उपकार निरंतर, पतितन-मन मल धोय।  
<a id="line-5"></a>जल, तरंग दोउ नाम उपाधी, वस्तुतस्तु इक सोय।  
<a id="line-6"></a>पै “कृपालु” हरिजन रूपी हरि, ही सों स्वारथ तोय॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

हे मन! श्री कृष्ण एवं उनके भक्त वस्तुतः पृथक् नहीं हैं। जहाँ श्रीकृष्ण रहते हैं वहीं भक्त रहते हैं, एवं जहाँ भक्त रहते हैं वहीं श्रीकृष्ण रहते हैं। ये दोनों एक दूसरे से पृथक् किसी भी काल में हो ही नहीं सकते। मयि ते तेषु चाप्यहम्''(गीता) श्रीकृष्ण एवं उनके भक्त एक दूसरे को प्रसन्न करते हुए एक दूसरे के भक्त बने रहते हैं। क रहस्य को बड़े-बड़े विद्वान् भी नहीं समझ पाते हैं। दोनों ही निरन्तर परोपकार की भावना से सांसारिक पतित जीवों के मन के महान् से महान् पापों को धोया करते हैं। जैसे जल एव तरंग ये दोनों नाम औपाधिक रूप से ही हैं, वास्तव में दोनों ही नाम एक ही वस्तु के हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि-यद्यपि दोनो एक हैं फिर भी तुझे तो भक्त रूपी भगवान् से ही काम है भगवान् रूपी भक्त तो भक्ति प्राप्त होने के बाद ही काम आयेंगे।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 79

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

यह अनौपचारिक, व्यक्तिगत और आंशिक संग्रह है।

मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
