सिद्धान्त-माधुरी · पद 25
अरे मन! हौं मानत हौं हार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: are mana! hauṁ mānata hauṁ hāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1अरे मन! हौं मानत हौं हार।
2तू जो चहत सोइ हौं दैहों, रखिहौं बात तिहार।
3तू चाहत इंद्रिय विषयन कहँ, चलु ढिग नंदकुमार।
4तिनकोइ शब्द परस तनु तिनकोइ, तिनकोइ रूप निहार।
5तिनकोइ सरस दिव्य रस तिनकोइ, दिव्य गंध रिझवार।
6इमि “कृपालु” लहि दिव्य विषय सब, बस गोलोक मझार॥
हिन्दी भावार्थ
अरे मन! मैं तुझसे हार मान रहा हूँ। अब तू जो कुछ चाहेगा मैं वही दूँगा और तेरी ही बात रखूँगा। तू एकमात्र इन्द्रियों के विषयों को ही चाहता है तो चल श्यामसुन्दर के पास। उन्हीं के दिव्य शब्द, उन्हीं के दिव्य स्पर्श, उन्हीं के दिव्य रूप को देख, उन्हीं के दिव्य प्रेम रस का पान कर एवं उन्हीं कौ दिव्य गंध का आस्वादन कर। 'कृपालु' कहते हैं कि इस प्रकार तुझे इन्द्रियों के समस्त विषय भी मिल जायेंगे एवं सदा के लिए तृप्ति भी हो जायगी और सदा गोलोक में निवास करोगे।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 80