सिद्धान्त-माधुरी · पद 26
अरे मन! स्वारथ को संसार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: are mana! swāratha ko sansāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1अरे मन! स्वारथ को संसार।
2विकसित कुसुम सुवास लेत जिमि, मधुकर करि गुंजार।
3जब ही कुसुम गिरत भूतल पर, भूलि न ताहि निहार।
4त्यों जग पुत्र, कलत्र, मित्र, पति, जहँ लगि नातेदार।
5बिनु स्वारथ कोउ बात करत नहिं, करु गंभीर विचार।
6ताते भजु “कृपालु” अब निशिदिन, नागर नंद-कुमार॥
हिन्दी भावार्थ
अरे मन! यह सारा संसार स्वार्थी है। जैसे खिले हुए फूल के ऊपर भँवरा गुंजार करता हुआ सुगंध लेता है। किन्तु जैसे ही फूल झड़कर गिर जाता है भँवरा उसकी ओर भूलकर भी नहीं देखता। उसी प्रकार पुत्र, स्त्री, पति, मित्र आदि जितने भी संसार के नातेदार हैं उनका जब तक स्वार्थ सिद्ध होता रहता है तब तक ही नातेदारी निभाते हैं। गम्भीरतापूर्वक विचार कर। 'कृपालु' कहते हैं कि इसलिए हे मन! तू भी इन स्वार्थियों को छोड़कर एकमात्र श्यामसुन्दर का भजन कर!
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 80-81