सिद्धान्त-माधुरी · पद 22
अरे मन! सुन उपनिषद विचार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: are mana! suna upanishada vichāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1अरे मन! सुन उपनिषद विचार।
2कोउ पितु मातु, पुत्र सुख कारन, करत न सपनेहुँ प्यार।
3तिमि कोउ पुत्र, मातु-पितु सुख हित, करत न कछु व्यवहार।
4कोउ तिय, पति-हित प्यार करत नहिं, अस कह वेद पुकार।
5तिमि कोउ पति, तिय-सुख कारन कछु, करत न यह उर धार।
6सब “कृपालु” निज सुख हित नित प्रति, जोरत नात हजार॥
हिन्दी भावार्थ
अरे मन! तू उपनिषदों का सार सुन। कोई भी माता-पिता अपने पुत्र के सुख के लिए स्वप्न में भी प्यार नहीं करते। उसी प्रकार कोई पुत्र भी अपने माता-पिता के सुख के लिए कुछ भी व्यवहार नहीं करता। कोई भी स्त्री पति के सुख के लिए पति से प्यार नहीं करती, ऐसा महापुरुषों का कथन है। उसी प्रकार कोई भी पति किसी स्त्री के सुख के लिए कुछ नहीं करता। 'कृपालु' कहते हैं कि सभी अपने सुख के लिए ही सर्वदा अनेक प्रकार के सम्बन्ध स्थापित करते हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 77-78