सिद्धान्त-माधुरी · पद 21
अरे मन! सुन इक अटपट बात।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: are mana! suna ika aṭapaṭa bāta
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1अरे मन! सुन इक अटपट बात।
2दृग वारेन को नेकु न दीखत, अचरज यदपि जनात।
3बिनु देखे दृगवंत अंध बिच, अंतर कछु न लखात।
4जिमि गज दंत विलोकन ही को, खाय न कछुक सकात।
5तिमि साधन-दृगबल हरि हेरत, पाव न पचि मरि जात।
6लोकहुँ माहिं “कृपालु” न दीखत, बिनु प्रकाश कहुँ रात॥
हिन्दी भावार्थ
हे मन! एक अनोखी बात सुन। बिल्कुल नहीं दिखाई पड़ता, यद्यपि यह बात आश्चर्यजनक है फिर भी सत्य है। बिना दिखाई पड़ने वाली आँखों एवं अंधों में अन्तर ही क्या है? जिस प्रकार हाथी के दाँत जो बाहर निकले रहते हैं, वे एकमात्र देखने के ही होते हैं, उनसे हाथी कुछ भी नहीं खा सकता। उसी प्रकार से योगी, तपस्वी आदि भी अपने साधनरूपी नेत्रों के बल से श्रीकृष्ण को खोजते रहते हैं, किंतु करोड़ों कल्पं में भी नहीं प्राप्त कर पाते। कह कर हारकर बैठ जाते हैं। का विषय तो यह है कि लोक में भी आँख वालों को बिना प्रकाश के रात में कुछ भी नहीं दिखाई पड़ता।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 77