सिद्धान्त-माधुरी · पद 20
अरे मन! यह संसार असार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: are mana! yaha sansāra asāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1अरे मन! यह संसार असार।
2पुत्र, कलत्र, मित्र आदिक सब, स्वारथ को संसार।
3तू समुझत सब प्यार करत मोहिं, सुत, पति, भगिनी, नार।
4तिमि समुझत सुत, पति, भगिनी, तिय, तू कर तिनसों प्यार।
5पै तू तो जानत निज सुख हित, करत कपट व्यवहार।
6पुनि “कृपालु” कत यह नहिं जानत, तेऊ तोहिं अनुहार॥
हिन्दी भावार्थ
अरे मन! इस संसार में कुछ सार नहीं है। जितने भी पुत्र, स्त्री, मित्र आदि हैं वे सब अपने स्वार्थ के लिए ही सम्बन्ध स्थापित करते हैं। तू समझता है कि मुझसे पुत्र, पति भगिनी, स्त्री आदि प्यार करते हैं उसी प्रकार तेरे पुत्र, पति भगिनी, स्त्री आदि भी यह समझते हैं कि तू उनसे प्यार करता है। इस प्रकार दोनों ही पक्षों में धोखा है। किन्तु तू यह तो जानता ही है कि मैं उन लोगों से अपनी स्वार्थ-सिद्धि के लिए ही कपट व्यवहार करता हूँ। 'कृपालु' कहते हैं कि फिर तू यह क्यों नहीं समझ पाता कि वे सब भी तेरे ही समान कपट व्यवहार कर रहे हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 76