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RADHEY RADHEY

सिद्धान्त-माधुरी · पद 19

अरे मन! यह जीवन दिन चार।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: are mana! yaha jīvana dina chāra

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1अरे मन! यह जीवन दिन चार।

2चारु चाँदनी चार दिना की, पुनि होइहिं अँधियार।

3तू मतिमंद, मूढ़ नहिं जानत, इन कपटिन व्यवहार।

4तू सोचत, हौं चतुरशिरोमणि, पै सब हैं इकसार।

5सबै सबन कहँ ठगन हेतु नित, बहुविधि स्वाँग सँवार।

6तजि “कृपालु” अब त्रिविध ईषणा, भजि ले नंदकुमार॥

हिन्दी भावार्थ

अरे मन! यह मनुष्य का शरीर चार दिन का है। जैसे शुक्ल पक्ष की सुन्दर चाँदनी के बाद कृष्ण-पक्ष की अँधेरी रात आ जाया करती है उसी प्रकार मानव देह छिन जाने पर फिर पछताना ही पड़ेगा। अरे मूर्ख मन! तू नहीं जानता इस संसार में एकमात्र कपट का ही व्यवहार होता है। तू यह समझता है कि हम सबसे अधिक चतुर हैं किन्तु यह बात नहीं है, तेरे ही समान सब सोचते हैं। सभी एक दूसरे को ठगने के लिए अपने-अपने साज-साजे हुए हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि अरे मन! अब तू तीनों प्रकार की कामनाओं को छोड़ दे एवं निरन्तर श्यामसुन्दर का भजन कर।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 75-76