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RADHEY RADHEY

सिद्धान्त-माधुरी · पद 18

अरे मन! यह जग एक सराय।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: are mana! yaha jaga eka sarāya

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1अरे मन! यह जग एक सराय।

2इस सराय में देश देश के, सौदागर सब आय।

3इस सराय में सोइ आवत जो, मायाबद्ध कहाय।

4इस सराय में कोउ कमात है, कोउ धन-मूल गमाय।

5इस सराय में चोर प्रबल हैं, काम क्रोध बहुताय।

6इस सराय में मिलत"कृपालुहिं"प्रेम भजे बलभाय॥

हिन्दी भावार्थ

अरे मन! यह संसार एक सराय के समान है जिसमें देश-देशान्तर के सौदागर आते-जाते रहते हैं। कोई सौदा खरीदने आता है, कोई सौदा करके वापस चला जाता है। इस सराय में कोई दूना चौगुना कमाता है, कोई मूलधन भी खो बैठता है। इस सराय में काम, क्रोध, लोभादि अनेक प्रबल चोर हैं। कृपालु' कहते हैं कि इसी सराय में श्यामसुन्दर के भजन करने से प्रेम रूपी अमूल्य निधि प्राप्त होती है।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 75