सिद्धान्त-माधुरी · पद 17
अरे मन! यह ऐसो जग जान।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: are mana! yaha aiso jaga jāna
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1अरे मन! यह ऐसो जग जान।
2करत रहे पवनासन जिन मुनि, विश्वामित्र महान।
3काम विवश किय तिनहुँ मेनका, मारि तानि दृगबान।
4ऋषि वशिष्ठ कहँ वधन बैठ सोइ, लै कर परशु कृपान।
5जब अस मुनि को काम क्रोध अस, दीख परत बलवान।
6तब “कृपालु” का गति औरन की, ताते भजु मन कान्ह॥
हिन्दी भावार्थ
अरे मन! यह संसार ऐसा है जो किसी को नहीं छोड़ता। विश्वामित्र हवा खा कर ही रहते थे किंतु मेनका अप्सरा ने अपने कटाक्षों से उनको मोहित कर लिया। वे ही विश्वामित्र वशिष्ठ महर्षि को मारने के लिए उन्हीं की कुटी के पीछे नंगी तलवार लिये बैठे हुए थे। जब ऐसे महामुनियों का भी काम, क्रोध ऐसा बलवान है तब 'कृपालु' कहते हैं कि साधारण जन को क्या बात है। इसलिए मन, श्यामसुन्दर की शरण में चला जा।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 74