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RADHEY RADHEY

सिद्धान्त-माधुरी · पद 16

अरे मन! मूरख निपट गँवार।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: are mana! mūrakha nipaṭa gaṁvāra

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1अरे मन! मूरख निपट गँवार।

2बिगरत आपु बिगारत मो कहँ, नेकु न करत विचार।

3कोटि-कल्प भटक्यो ज्योँ शूकर, विष्ठा-विषय मझार।

4बिनु सेवा जहँ पाइय मेवा, गयो न तेहि दरबार।

5दोउ कर-कमल पसारि निहारति, तोहिं वृषभानुदुलार।

6अस अवसर नर देह सुदुर्लभ, मिलत न बारम्बार।

7साधन बिनुहिं “कृपालु” द्रवत जो, को अस सरल उदार॥

हिन्दी भावार्थ

हे मन! तू वास्तव में अत्यन्त ही मूर्ख एवं नासमझ है। तू आप भी अपना नाश कर रहा है, साथ ही मेरा भी नाश कर रहा है। तू इस विषय में थोड़ा सा भी विचार नहीं करता। तुझे सांसारिक विषय-वासनारूपी विष्ठा में शूकर की तरह भटकते हुए करोड़ों कल्प बीत गये, फिर भी कुछ भी न पा रही हैं। ऐसा अवसर एवं देवदुर्लभ मानव-देह तुझे बार-बार न मिल सकेगा। 'कृपालु' कहते हैं कि सबसे बड़ी बात तो यह है कि वृषभानुनंदिनी के सिवा ऐसा सरल एवं उदार चित्तवाला और तुझे कौन मिलेगा जो बिना साधन के ही शरणागत को सदा के लिए अपना बना ले।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 73-74