सिद्धान्त-माधुरी · पद 15
अरे मन! मनमोहन मन लाय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: are mana! manamohana mana lāya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1अरे मन! मनमोहन मन लाय।
2सुन ले टुक निज कान खोलि मन, याको सरल उपाय।
3काउहिं युवतिहिं छेड़ युवक जब, तब युवती जरि जाय।
4पै विभोर ह्वै जाय सखिन सुनि, भई सगाई याय।
5त्यों निज-तनु-प्रिय को ही अब लौं, निज-प्रिय जानि लुभाय।
6अब दिय रसिक बताय कृपा करि, तेरो प्रिय बलभाय।
7अमर सुहाग “कृपालु” करिय मन, रसिक वचन पतियाय॥
हिन्दी भावार्थ
अरे मन! मनमोहन श्यामसुन्दर में अपने आप को अनुरक्त कर। अरे मन! कान खोलकर सुन। इसका अत्यन्त सरल उपाय है। देख, जब किसी युवती को कोई अपरिचित युवक छेड़ता है तब वह युवती क्रोध से आग बबूला हो जाती है, किन्तु तत्काल ही जब किसी अपनी अन्तरंग सखी से सुनती है कि इसी युवक से उसकी सगाई हुई है तो वह उसी छेड़खानी में विभोर हो जाती है। इसी प्रकार तूने अब तक अपने शारीरिक प्रियजन को ही अपनी आत्मा का प्रियजन मानकर प्यार किया। अब रसिकों ने कृपा करके यह रहस्य बता दिया कि तू शरीर नहीं है, तेरा प्रियतम एकमात्र श्याम सुन्दर ही है। 'कृपालु' कहते हैं यदि तू इस रसिक वाणी पर विश्वास कर ले तो तत्काल श्यामसुन्दर से प्यार हो जाए एवं तेरा सुहाग अमर हो जाय।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 72-73