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RADHEY RADHEY

सिद्धान्त-माधुरी · पद 14

अरे मन! तू मेरो मत मान।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: are mana! tū mero mata māna

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1अरे मन! तू मेरो मत मान।

2"अनन्य चेताः सततं यो मां", गुन येहि गीता-ज्ञान।

3तन, मन, प्राण समर्पण करि जो, कर नित हरि को ध्यान।

4ताको हरि अति सुलभ जान मन, रह न कामना आन।

5तर्क, वितर्क, कुतर्क आदि की, तजि दे अपनी बान।

6रहु “कृपालु” सद्गुरु शरणागति, करु गोविंद गुनगान॥

हिन्दी भावार्थ

हे मन! तू मेरे सिद्धान्त को मान लो! 'अनन्य चेताः इस गीता महावाक्य का यही अभिप्राय है कि जो तन, मन प्राण समर्पण करके श्यामसुन्दर का निरन्तर स्मरण करता है वे उसके लिये सुलभ हैं, किन्तु अन्य कामनायें नहीं रहनी चाहिये। हे मन! तू तर्क, वितर्क आदि करने की अपनी आदत छोड़ दे। 'कृपालु' कहते हैं कि अपने गुरु की शरण में रहकर गोविन्द गुण गाओ।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 72